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सिंदूर - कविता


 

‟सिंदूर“


सिंदूर जब समर्पण पर आ जाए,


तो पति परमेश्वर बन जाता है।


सिंदूर जब जिद पर आ जाए,


तो सावित्री बन जाता है।


सिंदूर की लाज बचाने मैं


रावण के कुल का नाश हुआ,


सिंदूर की खातिर ही


महाभारत का आगाज हुआ।


ये भारत केवल देश नहीं


स्वाभिमान है हम सभी का।


सिन्दूर हिमांशी का पोंछा जाता है..


तो प्रतिशोध  का नाम सोफिया होता है।




‟देवेश“

दूरदर्शन: वो सुनहरी यादें

 

दूरदर्शन: वो सुनहरी यादें

वो छत पर जाकर एंटीना घुमाना, 

"साफ़ हुआ क्या?" ज़ोर से चिल्लाना। 

धुंधली तस्वीरों के बीच जब चेहरा निखर आता था, 

पूरा मोहल्ला जैसे खुशियों से भर जाता था।

वो इतवार की सुबह, 

वो 'रामायण' का दौर, गलियों में सन्नाटा, न कोई शोर।

 'चित्रहार' के गानों में वो सुकून की बात, 

और 'शक्तिमान' देखने को हर बच्चा बेताब।

रंगों से पहले वो 'ब्लैक एंड व्हाइट' का ज़माना, 

लिज्जत पापड़ और वाशिंग पाउडर निरमा का तराना। 

समाचार की वो गंभीर और धीमा स्वर, 

शाम होते ही शुरू होता था 'कृषि दर्शन' का सफर।

वो 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' की एकता निराली,
 

हर घर में बसती थी एक भोली सी खुशहाली। 
आज हज़ारों चैनल हैं, पर वो बात कहाँ? 

वो सादगी, वो अपनापन, वो जज़्बात कहाँ?

दूरदर्शन सिर्फ एक डिब्बा नहीं, 

एक एहसास था, हम सब के बचपन का सबसे सच्चा विश्वास है ।


मनोज कुमार दुबे
अभियांत्रकी सहायक
दूरदर्शन केंद्र भोपाल 

बिना जड़ों के पेड़

 बिना जड़ों के पेड़

बिना जड़ों के पेड़ हो गए, 
जिनका कोई गाँव नहीं।
सिर पर हाथ बुजुर्गों का, 
वो पीपल वाली छाँव नहीं।
मिल कर काम सभी करते हैं,
दुआ सलाम सभी करते हैं।
बैरी मित्र परख न पाते,
गलती करें, डपट न पाते।
फूलें फलें या मर खप जाएं,
इनका कोई सुझाव नहीं।
बिना जड़ों के पेड़ हो गए,
इनका कोई गाँव नहीं।
होली और दीवाली आती,
गर्मी की छुट्टी कट जाती।
कोई नहीं कहता कि आओ,
अर्सा बीता शक्ल दिखाओ।
परिवारी हो गए पाहुने,
इनका कोई लगाव नहीं।
सिर पर हाथ बुज़ुर्गों का,
वो पीपल वाली छाँव नहीं।
आ जाओ हम नहीं भगाते,
न आओ, हम नहीं बुलाते।
फ़र्ज़ थे जो भी अदा हो गए,
अब हम कडवी दवा हो गए।
संबंधों और अनुबंधों का,
इन पर कोई दबाव नहीं।
सिर पर हाथ बुज़ुर्गों का,
वो पीपल वाली छाँव नहीं

अनीता श्रीवास्तव

रहने जाएं किस बस्ती में

 रहने जाएं किस बस्ती में


आसमान से नफरत बरसी,
आग लगी है हर बस्ती में।
अरमानों की गठरी लादे,
रहने जाएं किस बस्ती में।
जब-जब हमने दिया जलाया,
जुल्म हवाओं ने है ढाया।
मन में ढलती सांझ लिए हम,
रहने जाएं किस बस्ती में।
खेतों कि उम्मीद जहां थी,
मीलों फैली रेत वहां है।
प्रेम के पंछी भूखों मरते,
कहने जाएं किस बस्ती में।
अपनों में वो बात कहाँ है,
ग़ैरों से आबाद जहां है।
घातों से विश्वास बचा कर,
रहने जाएं किस बस्ती में। 
धरती के टुकड़े-टुकड़े पर,
घर कितने आबाद हुए हैं।
धरती ही आबाद नहीं है,
रहने जाएं किस बस्ती में।

अनीता श्रीवास्तव


लेखिका का परिचय -

अनीता श्रीवास्तव
कवयित्री, कथाकार, व्यंग्यकार, मंच संचालक, पूर्व रेडियो एवम टी वी उद्घोषिका
पिता - स्मृति शेष रमेश चंद्र श्रीवास्तव
पति - श्री वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव 

शिक्षा- एम एस सी (वनस्पति शास्त्र) ( बुंदेलखण्ड वि वि, झाँसी) 
बी एड ( बरकतुल्लाह वि वि भोपाल ) 
बी जे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल

200 से अधिक रचनाएँ विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशितl 

भास्कर मधुरिमा, देशबंधु, पत्रिका, इंदौर समाचार,सम्पर्क क्रांति, विज्ञान पत्रिका, सत्य की मशाल, संगिनी (कहानी, कविता,व्यंग्य) बच्चों का देश, नूतन कहानियाँ, साहित्य संस्कृति, उजाला मासिक ( बाल कविताएं) एवम व्यंग्य की राष्ट्रीय स्तर की अग्रणी पत्रिकाओं व्यंग्य यात्रा, अट्ठहास, रंग चकल्लस,सहित विभिन्न अखबारों में लगातार रचनाएँ प्रकाशित l

कनाडा से प्रकाशित पाक्षिक वेब पत्रिका साहित्य कुंज  में नियमित लेखन l

कहानी धरती की छाती में ( भू- जल संरक्षण पर आधारित) एवम " पुरस्कार" (नशामुक्ति पर आधारित) आल इंडिया रेडियो से प्रकाशित l
काव्य पाठ का प्रसारणl वार्ता एवम रेडियो नाटक में प्रतिभाग l 
प्रकाशित कविता संग्रह जीवन वीणा ( अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज) 
 कहानी संग्रह *"तिड़क कर टूटना"* (सनातन प्रकाशन, जयपुर) 

बाल गीत संग्रह- *बंदर संग सेल्फी*
स्वयम का यू ट्यूब चैनल-
 शब्द वीणा
 ब्लॉग - बत्तोरानी

संप्रति

शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,  टीकमगढ़, मध्यप्रदेश में उच्च माध्यमिक शिक्षक, जीवविज्ञान के पद पर सेवारत साथ ही लगातार लेखन में सक्रिय l

माँ, तुम हो जीवन की धारा,

माँ, 

तुम हो जीवन की धारा, 

तुमसे ही है सब कुछ प्यारा। 

तेरी ममता की छांव में, सपनों का संसार सजा।


तेरी हंसी में है जादू, तेरी बातों में मिठास। 

तेरे बिना ये जीवन, जैसे हो सूना आकाश।

तेरी गोद में सुकून है, तेरे आंचल में प्यार। 


तेरे बिना ये दुनिया, लगती है बेकार।

माँ, तुम हो सबसे न्यारी, तुमसे ही है ये दुनिया सारी। 

तेरे बिना कुछ भी नहीं, तुम हो जीवन की सच्ची कारीगरी।


मनोज कुमार दुबे 
अभियांत्रिकी सहायक 
दूरदर्शन केंद्र भोपाल 

अदृश्य प्रेम

 बारिश में मुंडेर  पर भीगते हुए भी  मेरा इंतजार करते मेरे मित्रों (पक्षियों) के प्रेम को देखकर कुछ लिखा है ..


अदृश्य प्रेम..

बारिश बहुत है 

फिर भी..

कर रहे हो भीगते हुए मुंडेर पर

बैठ मेरा इंतजार..!


मैं घर पर बैठ 

सोच रहा था तेरे

आशियाने का..

कहां होगे,

पर मिले मुंडेर पर 

 बारिश मे भीगते

हुए ..

तेरा अपनापन 

भिगा गया मेरा मन !


सुनो जब  मिलने की तडप दोनो को है ..

तो कभी घर भी आया करो..

तेरी आस में खिड़कियां खुली 

रखता हूं ..

मै सुकून से रहूं और तुम 

भीगते रहो .. 

अच्छा नहीं है , घर आ जाया करो..

यूं न मुंडेर पर बैठ भीगा करो!


यूं न मुंडेर पर बैठ भीगा करो !!



✍️  आर के बाजपेयी 

        सेवानिवृत्त सहायक निदेशक (अभि.)


मै हो गया तुम।।।

 मै हो गया तुम।।।


उषा की पहली किरण तुम, संध्या की भक्ति वंदन तुम।


दफ्तर की नोटिंग में तुम,

मीटिंग की मेटर में तुम।


मंज़िल की सफर हो तुम,

नाश्ते की बटर हो तुम।


शेकर की शेक में तुम,

जूस की फल रस हो तुम।


कलाकार की कला में तुम,

राग की संगीत हो तुम।

वाद्य की रुनधुन हो तुम।।


कार्य की प्रेरणा हो तुम,

 मन की चेतना हो तुम।

दुख की वेदना हो तुम।।


सुंदरता की सौम्या हो तुम,

मधुरता की राम्या हो तुम।


भूल जाने की कोशिश में,

याद बहुत याद आती तुम।


इस कदर घुल गयी अक्स में,

मैं तो मैं रहा ही नही, 

 हो गया हूँ,

मैं सिर्फ तुम,तुम और तुम।।।



विकास कुमार

कार्यक्रम अधिशासी

दूरदर्शन केंद्र शिमला


अभिमान

हे इंसान छोड़ दे,अभिमान 

नहीं तो अकेला रह जाएगा 

माता-पिता,परिवार और समाज में 

अपना अस्तित्व न बना पाएगा

अभिमान से परिश्रम , ज्ञान - सम्मान 

सभी नष्ट हो जाएगा 

हे इंसान छोड़ दे, अभिमान 

नहीं तो अकेला रह जाएगा 


अपने अभिमान को छोड़ आ श्मशान में वहां

 जहां बड़े संत , महंत, अमीर 

पंच तत्व में विलीन हो गए हैं.

 नहीं तो ये अभिमान तेरी आत्मा 

को कष्ट बहुत पहुंचाएगा

 हे इंसान छोड़ दे अभिमान 

नहीं तो अकेला रह जाएगा 


अभी भी वक्त है संभल जा 

छोड़ अपनी हठ , अभिमान

सब कुछ यथावत वापस मिल जाएगा 

हे इंसान छोड़ दे,अभिमान 

नहीं तो अकेला रह जाएगा



ओमप्रकाश वर्मा
अभियांत्रिकी सहायक
दूरदर्शन केंद्र भोपाल

एक खूबसूरत सा काला चश्मा

 एक खूबसूरत सा 

काला चश्मा 


चेहरे पर सजाकर 

फोटो

 क्लिक करवाली 

उसने 

बाँये बैठे दोस्त ने कहा

 फोटो तो बड़ी शानदार है 

दाएं वाला बोल उठा 

बस फोटो ही तो शानदार आती है

 आगे के शब्द 

अनकहे बहुत कुछ बोल गए

 इसी फोटो ने 

बेचारी भाभी जी को 

बरसों पहले 

फांस लिया था .

ऐसी हंसी टिटौली 

एक चाय के टपरे पर

 और साथ में एक अनुत्तरित प्रश्न 

क्या करता होगा इन फोटों का...?

नाती पोतों के साथ खेलने की उम्र में 

यह कैसा शौक ?

अब भला इन्हें किसे भेजना है ?

सालों पहले 

एक तो बड़ी मुश्किल से फस पाई थी 

दूसरी की उम्मीद व्यर्थ है  मेरे भाई 

वह भी खिल खिलाकर हंस पड़ा

 कहने लगा मोबाइल में एक फोल्डर बना रहा हूं जिसमें अपने सिंगल फोटो 

सहेजता जाता हूं 

वाकई 

अपने ऊपर हंसने का माद्दा 

बिरले ही मिलता है 

उसने वह फोल्डर दिखाया 

जिसमें अजीब अजीब भाव भंगिमा वाले कई सिंगल फोटो  थे 

खिल खिलाते हुए बोला

दोस्त जीवन के रंगमंच का परदा

 जब गिरे तो 

मेरा  फोटो किसी को ढूँढना न पड़े.

इसीलिए मैं 

इन्हें स्वयम् ही 

सहेज लिया करता  हूं . 

इतनी गंभीर बात को 

वो कुछ इस timing से कह गया कि

हंसी का फव्वारा  फूट पड़ा 

जो धीरे-धीरे ..... 

आंसुओं में डूब गया ।



संजय गुप्ता, 
सहायक अभियंता एवं प्रभारी राजभाषा अधिकारी
दूरदर्शन केंद्र भोपाल

प्रेम और विश्वास

 प्रेम और विश्वास।।।


नदी समान है, प्रेम की धार।

नाव समान है, विश्वास की पतवार।।।


तूफान आये जब, नदी में उफान।

विश्वास तुम्हारा ही संभालेगा कमान।।।


प्रेम करना केवल, नही है काफी।

विश्वास अटूट मुझपर, तुम्हारा हो साथी।।।


प्रेम की डोर, न मिले आसानी से।

बंधे न पाया, हर कोई, इस कहानी से।।।


गलतफहमी की जगह, वहाँ नही होता है।

प्रेम और विश्वास जब गहरा, गहरा और गहरा होता है।।।



विकास कुमार


आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में


रोज सुबह उठते एक ही सवाल कि 

आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 

दिनभर ऑफिस में काम और उसके बीच एक ही सवाल

 कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


रात में थककर ऑफिस से घर आते - आते फिर वही सवाल

 कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


नींद से बोझिल आँखे होने पर भी 

सोने से पहले एक ही सवाल 

कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


जब सोने लगता हूं तो नींद चली जाती है 

टहलने रोज छत पर फिर सोचता हूं 

कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


रोज यादों का गला घोंटता हूं 

उसमें कुछ अपने थे जिन्हें समेटता हूं 

तेरी याद तो गई नहीं दिल से 

न गई तेरी खुशबू मेरे कमरे से 

बिखर गई है तू मेरे जीवन में तेरे जाने के बाद फिर यही ख्याल 

कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


दोस्त मिलते हैं और पूछते हैं मेरा हाल

 कैसे बताऊं मैं उन्हें 

कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


शरीर के साथ-साथ मन भी थक चुका है फिर सोचता हूं इतनी उदासी मेरे अंदर कहां से आ गई 

मेरी खुशमिजाजी कहां गई मैं 

फिर वही खुद से सवाल जिसका नहीं कोई जवाब कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में 


पूरी उम्र खो दी सोचते -  सोचते 

आज तक नहीं समझ आया 

कि आखिर चल क्या रहा है जिंदगी में.. 



के के बाथम्

उच्च श्रेणी लिपिक

दूरदर्शन केंद्र भोपाल


मां मां होती है - कविता

\\ मां \\

 


मां मां होती है 

पर कहां हार मानती है


 बच्चा जब रोता है तो 

उसे सीने से लगाकर चुप कराती हैबच्चा भूखा होता है तो छाती से लगाकर दूध पिलाती है 

पर कहां हार मानती है 


बच्चा बीमार होता है तो रात भर निशब्द होकर निहारती है 

उसे छाती से लगाकर सुलाती है उसे दवा पिलाती है 

पर कहां हार मानती है 


बच्चा सुबह उठता है तो उसके चेहरे पर ममता की मुस्कान आती है 

बच्चा जब खिलखिलाता है तो  उसको काला टीका लगाकर नजर उतारती है  

पर कहां हार मानती है 


बच्चे को खिलाकर खुद भूखी सो जाती है 

सारे कष्टों को छुपा कर उसको धैर्य बंधाति है 

पर कहां हार मानती है 


सारे रिश्ते तोड़कर भी 

बच्चे की शादी पर सारी खुशियां दौलत लुटाती है  

पर कहां हार मानती है 


बच्चे के इल्जाम लगाने पर दिल टूटने पर भी शांत रह जाती है 

पर कहां हर मानती है 


बच्चों के घर छोड़ जाने पर उसकी याद सताने पर 

खुद को लाचार पाने पर मां फिर हार मान जाती है 

मां ऐसी ही होती है


ओम प्रकाश वर्मा

 अभियांत्रिकी सहायक दूरदर्शन केंद्र भोपाल