मानव जीवन देव दुर्लभ कहा गया है।तो इस देव-दुर्लभ जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए या लक्ष्य क्या है।आध्यात्मिक रूप से कहें तो मोक्ष प्राप्ति और भौतिक दृष्टि से सुख प्राप्ति।लौकिक जीवन में मनुष्य सुबह से शाम तक या दिन-रात सारे क्रिया कलाप,कर्म केवल इसलिए करता है कि उसे सुख प्राप्ति हो।मोक्ष के लिए भी धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष कह कर सांसारिक सुख को मोक्ष का एक सोपान समझा गया है।मनुष्य दिन रात सुख प्राप्ति के चिंतन में ही रहता है।गृहस्थ हो या सन्यासी;लक्ष्य केवल सुख;किसी को भौतिक तो किसी को पारलौकिक।
यह दूरदर्शन भोपाल के सदस्यों के रचनात्मक सर्जन के निवेश का संकलन है I दूरदर्शन और आकाशवाणी अपने नियमित प्रसारण के माध्यम से हमारी राजभाषा हिंदी को देश के हर अंचल तक सुलभ करवाने के सबसे सशक्त माध्यम हैं. दूरदर्शन भोपाल अपनी इस जिम्मेदारी को अत्यंत सजगता से निर्वाह करता आ रहा है
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जीवन एक : पहलू अनेक
* जीवन एक : पहलू अनेक *
जीवन देव दुर्लभ है,जीवन उपहार है, जीवन संघर्ष है,जीवन सौंदर्य है,जीवन आस्था,विश्वास,मेल जोल और प्रेम के मधुरिम पुष्पों से सुगुम्फित हार है,जीवन आचार है ,जीवन व्यवहार है,जीवन अवसर है जीवन नश्वर है जीवन पानी केरा बुदबुदा है,जीवन सत्य है, जीवन असत्य है,जीवन प्रपंच है,जीवन एक रंगमंच है ,जीवन एक खेल है,जीवन एक रेल है,जीवन प्रकृति की जेल है।न जाने कितने कथन हैं जीवन के बारे में;कह सकते हैं जीवन जिसने जैसा जिया,
जीवन देव दुर्लभ है,जीवन उपहार है, जीवन संघर्ष है,जीवन सौंदर्य है,जीवन आस्था,विश्वास,मेल जोल और प्रेम के मधुरिम पुष्पों से सुगुम्फित हार है,जीवन आचार है ,जीवन व्यवहार है,जीवन अवसर है जीवन नश्वर है जीवन पानी केरा बुदबुदा है,जीवन सत्य है, जीवन असत्य है,जीवन प्रपंच है,जीवन एक रंगमंच है ,जीवन एक खेल है,जीवन एक रेल है,जीवन प्रकृति की जेल है।न जाने कितने कथन हैं जीवन के बारे में;कह सकते हैं जीवन जिसने जैसा जिया,
साइकिल - एक प्रेम कथा
साइकिल और मेरा अभी तक सारी उम्र का साथ चलता रहा , कभी मजबूरी में - तो कभी शौक से। बचपन में 25 पैसे में किराए से 1 घंटे के लिए साइकिल मिला करती थी, उसी से दोस्तों ने साइकिल चलाना सिखाया।फिर जब पापा ने पहली साइकिल खरीदी तो उस पहली रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। जब भी आंख खुलती थी , उस साइकिल को निहारते- निहारते फिर सो जाता। एक बार हमारे परिचित बगैर लॉक किए साइकिल घर के बाहर खड़ी कर गए । तो मै लगभग दो-तीन घंटे उनकी इजाज़त के बगैर ही उनकी साइकिल यहां - वहां दौड़ाता रहा।फिर सेंधवा जैसी जगह स्कूल - कॉलेज भी कभी पैदल और कभी साइकिल से जाता रहा । मेरे एक रिश्तेदार ने भी किराए की साइकिल दुकान खोली ,तो मैं अपनी निशुल्क सेवाएं वहीं बैठकर देने लगा।हालाँकि वह स्कूल की पढ़ाई का समय था,परन्तु मुझे किताबों से ज्यादा साइकिल पर प्यार आता । लेकिन जल्दी घर वालों की डाँट- डपट ने साइकिल दुकान छुड़वा दी ।स्कूल खत्म कर इंदौर आगे की पढ़ाई के लिए आया तो वहां भी अपने निवास से कॉलेज साइकिल से ही आना - जाना होता। इंदौर वैसे भी साइकिलिंग के लिए अच्छा शहर है, क्योंकि वहां की सड़कों में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हुआ करते थे । मुझे अच्छे से याद है कि एक बार तो मैं अपने भाई को पीछे बैठा कर सुदामा नगर से पलासिया के पास वंदना नगर एक ही दिन में 2 चक्कर लगा आया। अर्थात दिन भर में लगभग 30 किलोमीटर !!
लछमा

लछमा, हाँ यही नाम है इस छोटी सी बेटी का l शहर के कोलाहल से दूर बिहार का एक छोटा सा गाँव, और इसी गाँव के रहने वाले एक गरीब परिवार की बेटी, पिता और माँ दोनों सुबह से ही खेत पर मजदूरी करने चले जाते और घर पर रह गए छोटे-छोटे दो भाईयों का ध्यान रखने की जिम्मेदारी उठाती लछमा l
सुबह
होती, माँ की आवाज आती चल उठ बिट्टो, सूरज निकल आया, उस पर अलसाई, उनींदी सी लछमा
का जबाब माँ थोड़ी देर रुक जा ना, नीद आ रही है, माँ कहती बेटी तू सोती रहेगी तो
हमें भी काम पर जाने को देर हो जाएगी और तब नन्ही से लछमा मान मारकर उठ जाती,
देखती बगल में सो रहे दोनों छोटे भाईयों को और मन ही मन सोचती कितना अच्छा होता
यदि मैं भी.... l
बेटी को मत समझो भार जीवन का है ये आधार
वर्तमान परिद्श्य में लोक प्रसारण में हिन्दी की भूमिका
वर्तमान परिद्श्य में लोक प्रसारण में हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है l हमारा राष्ट्र हिन्दी राष्ट्र है तथा अधिकतर लोग हिन्दी में ही अपने दैनिक कार्य करते है एवं अपने आपको, अपने विचारों को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकते है आज हमने विश्व में देखा है कि अपनी मातृ भाषा में काम करके भी विभिन्न देशों ने सफलता का परचम लहराया है, इसमें प्रमुख देश है चीन, फ्रांस, जापान आज चीन दुनिया में विकसित देशों की गिनती में है फ्रांस जापान भी विकसित देशों में आते है l वो सभी अपनी मातृभाषा में काम करते है एवं उनके लोक प्रसारक अपनी मातृभाषा में ही प्रसारण करते है l
बेटी बचाओ... बेटी पढ़ाओ
कहानी का परिवेश है, मंदसौर और नीमच के बीच मुख्य-सड़क से जुड़े गाँव की जहाँ वांछड़ा जाति के लोग वेश्यावृति का घंघा करते हैl
मैं
और मेरी टीम वांछड़ा जाति पर जानकारी लेने यहाँ पहुंचे थे l चूँकि ऐसी जगहों पर
जाना जोखिम से भरा होता है, अत: हम लोगों ने एक समाज सेविका (जिनको वो लोग बहुत
आदर करते थे) को साथ ले लिया जैसे ही उन्हें पता चला की यह एक मिडिया के लोग है, उन्होंने
बात करने से मना कर दिया...
फिर
भी कुछ लोग एक सामान्य सी बात करके चले गये...
समाज
– सेविका ने हमें बताया की यही एक मात्र लोग हैं, जो “बेटी पैदा होने पर खुशियाँ
मनाते हैं l”
वो
इसलिए की अगर बेटी पैदा होगी तो वेश्यावृति से घर का काम चलता रहेगा,
शाम
को हम लोग अपने गेस्ट-हाउस में आ गये... रात होते ही अचानक मन में ख्याल आया की
क्यों न उस मुख्य सड़क का भ्रमण किया जाये जहाँ पूरी रात राह चलते वेश्यावृति का
काम चलता है l
अनुशासन नियमावली के उल्लेखनीय पहलू
केन्द्रीय शासन कार्मिकों के लिये अनुशासन नियमावली के उल्लेखनीय पहलू
केन्द्रीय शासन के अधिकारयों के समक्ष कई बार ऐसी स्थितियों आती है जब उन्हें अपने मातहत कर्मचारियों के कार्यों की निंदा करने व उनके द्वारा की गयी अनुशासन हीनता के लिये कार्यालयीन अनुशासन बनाये रखने के लिये उनका स्पष्टीकरण माँगा जाना अनिवार्य हो जाता है जिससे कि तथ्यों को सामने लाया जा सके साथ ही साथ शासकीय कर्मी को न्याय पूर्ण एक अवसर दिया जा सके जिससे कि वह अपना पक्ष समुचित रूप से प्रस्तुत कर सके l
स्वच्छ भारत
स्वच्छ भारत
प्रस्तावना –
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने
भारत की आजादी से पहले ही एक स्वच्छ भारत का सपना देखा था, उनका मानना था कि
स्वच्छता से ही हम स्वयं को स्वस्थ रख सकते हैं l अपने आस पास की साफ सफाई हमारा
कर्तव्य है l इसके लिये गाँधी जी बहुत प्रयास किये परन्तु वह सफल न हो सके l आजादी
के ७० सालों के बाद भी गाँधी जी का स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं हो सका है l गाँधी
जी के इसी सपने को पूरा करने के लिये हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी जी ने गाँधी जी की १४५ वी जयंती (०२ अक्टूबर २०१४) को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुवात
की l इस अभियान का उद्देश्य ०२ अक्टूबर २०१९ (गाँधी जी की १५० वी जयंती) तक सम्पूर्ण
भारत को स्वच्छ भारत बनाना है l
स्वच्छता की आवश्यकता –
हमारे दैनिक जीवन में स्वच्छता का विशेष महत्व
है l चूँकि एक स्वच्छ और स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है
और एक स्वस्थ मस्तिष्क में ही सकारात्मक विचारों का जन्म हो सकता है l
आनंद विभाग के संदर्भ में - सत चित का आनंद
सत चित का आनंद
श्रीमद
भागवत पुराण में परमात्मा के आनंद स्वरुप की स्तुति की गई है जो जीवन के तीनों ताप
(आधिभौतिक, आधिदैविक और अध्यात्मिक) का समन करने वाला और उत्पत्ति, स्थित और विनाश
का कारक है l
सच्चिदानंद
रूपायै विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्र् य विनाशायै
श्रीकृष्णायै
वयं नुम: ll1ll
घरेलू हिंसा – एक सामाजिक अभिशाप
पोस्टर आधारित कथा लेखन प्रतियोगिता” (दितीय पुरस्कार विजेता)
“हिन्दीतर वर्ग”
“घरेलू हिंसा – एक सामाजिक अभिशाप”
कथाकार – ज्योति राधाकृष्णन
दिल्ली
शहर में एक धनाड्य परिवार की कहानी पर नज़र डालते हैं l संयुक्त परिवार की अद्भुत
मिसाल थी इनकी जिन्दगी l परिवार में बूढ़े-माता-पिता, उनके तीन पुत्र सपरिवार काफी
प्रेम से रहते थे l तीनों पुत्रों के संतानों में केवल एक ही पुत्री थी, जिससे वो
सबकी काफी लाडली थी l दुसरे भाइयों की तुलना में बेटी “सुनीता” को काफी सराहा और
प्रोत्साहन मिलता था l सभी उसकी हर इच्छा पूरी करते l परिवार के बड़े काफी पढ़-लिखे
नहीं थे l उनका व्यापार पुश्तों से चला आ रहा था, अत: लडकों की उच्च शिक्षा पर कभी जोर
नहीं दिया गया lघरेलू हिंसा
पोस्टर आधारित कथा लेखन प्रतियोगिता” (प्रथम पुरस्कार विजेता)
“हिन्दीतर वर्ग”
कथाकार – मीना श्रीवास्तव
सुबह-सुबह
मैं चाय की चुक्की ले रही थी तभी फोन की घंटी बनी l मैंने फोन उठाया और नम्बर नया
देख थोड़ा मन उलझा . हैलो, कहते ही एक अजनबी महिला ने मुझे बताया कि आज आपकी काम
वाली बाई नहीं आने वाली उसका फोन आया था एवं सबको सूचित करने को कहा था अत: आपका
नंबर ढूढ़ आपको सूचित कर रही हूँ .
आशा एक संघर्ष
पोस्टर आधारित कथा लेखन प्रतियोगिता” (दितीय पुरस्कार विजेता)
“हिन्दी वर्ग”
“आशा एक संघर्ष”
“कुछ हादसे ऐसे होते हैं,
पर जिन्दा नहीं रहता .”
कहानी
है शहर से लगे हुये एक गाँव की गाँव अभी पूर्ण रूप से विकसित तो नहीं हुआ है,
गाँव
के सारे लोगों में खूब साम-जस्य सुख-दुख में सब साथ खड़े रहते हैं l उसी गाँव के एक निर्धन परिवार की बेटी
आशा.... खूब चंचल और सभी की मदद के लिए हमेशा तैयार एक दिन भी न दिखे तो सभी
पूंछने चले आते आशा ठीक है ना... बाबूजी थोड़ा बुखार आ गया था और कुछ नहीं .
आधिकारों के रंग
पोस्टर आधारित कथा लेखन प्रतियोगिता” (प्रथम पुरस्कार विजेता)
“हिन्दी वर्ग”
आधिकारों के रंग
आधिकारों के रंग
कथाकार – संजय गुप्ता
ठण्डी
हवा का एक झोंका, और वह हौले से चित्कार उठी l उसने साड़ी से बड़े ही करीने से अपनी
गरदन और पीठ के पीछले हिस्से को ढ़कने का असफल प्रयास तो
किया, परन्तु ये बैरन बयार जैसे आज सब कुछ उघाड़ देना चाहती थी l उसकी पीठ और गरदन
पर बने ये निशान असल में उसके अंतर्मन पर
अंकित हो चुके थे l
हाय
! क्या नारी होना अभिशाप है ?
आज
की दौड़ती-भागती जिन्दगी भला एक पहिये पर कहाँ चल पाती है ?
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