जीवन और हमारी अवधारणाएं
जीवन अर्थात् जन्म से मरण तक की संपूर्ण यात्रा ︳मानव के इस संसार रूपी भवसागर में आने से लेकर संसार त्यागने तक का सफर ︳किसी का सफर लंबा होता है तो किसी का छोटा ︳मानव की इस परिप्रेक्ष्य में सोच एवं अवधारणा यही है कि “प्रभु की इच्छा” और “भाग्य का लेखा” ︳ कुछ जन इसे किसी व्यक्ति विशेष के "कर्म फल" की भी संज्ञा देते हैं︳
जीवन को कई प्रकार से परिभाषित किया गया है - कुछ इसे अबूझ पहेली तो कुछ इसे अनजान राह बताते हैं ︳ वास्तव में जीवन सुख और दुख का संगम है ︳ हमें हमेशा लगता है कि हमारे जीवन के तराजू पर दुख का पलड़ा भारी है ︳ यह शायद हमारा भ्रम है ︳ हमारे पास इस तथ्य का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है︳ यदि हम भगवान के अस्तित्व पर विश्वास रखते हैं तो हमें उनके न्याय पर भी विश्वास रखना चाहिए, ऐसा मस्तिष्क सोचता है पर हमारा अंतर्मन नहीं ︳
जीवन अर्थात् जन्म से मरण तक की संपूर्ण यात्रा ︳मानव के इस संसार रूपी भवसागर में आने से लेकर संसार त्यागने तक का सफर ︳किसी का सफर लंबा होता है तो किसी का छोटा ︳मानव की इस परिप्रेक्ष्य में सोच एवं अवधारणा यही है कि “प्रभु की इच्छा” और “भाग्य का लेखा” ︳ कुछ जन इसे किसी व्यक्ति विशेष के "कर्म फल" की भी संज्ञा देते हैं︳
जीवन को कई प्रकार से परिभाषित किया गया है - कुछ इसे अबूझ पहेली तो कुछ इसे अनजान राह बताते हैं ︳ वास्तव में जीवन सुख और दुख का संगम है ︳ हमें हमेशा लगता है कि हमारे जीवन के तराजू पर दुख का पलड़ा भारी है ︳ यह शायद हमारा भ्रम है ︳ हमारे पास इस तथ्य का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है︳ यदि हम भगवान के अस्तित्व पर विश्वास रखते हैं तो हमें उनके न्याय पर भी विश्वास रखना चाहिए, ऐसा मस्तिष्क सोचता है पर हमारा अंतर्मन नहीं ︳

















