दूरदर्शन: वो सुनहरी यादें

 

दूरदर्शन: वो सुनहरी यादें

वो छत पर जाकर एंटीना घुमाना, 

"साफ़ हुआ क्या?" ज़ोर से चिल्लाना। 

धुंधली तस्वीरों के बीच जब चेहरा निखर आता था, 

पूरा मोहल्ला जैसे खुशियों से भर जाता था।

वो इतवार की सुबह, 

वो 'रामायण' का दौर, गलियों में सन्नाटा, न कोई शोर।

 'चित्रहार' के गानों में वो सुकून की बात, 

और 'शक्तिमान' देखने को हर बच्चा बेताब।

रंगों से पहले वो 'ब्लैक एंड व्हाइट' का ज़माना, 

लिज्जत पापड़ और वाशिंग पाउडर निरमा का तराना। 

समाचार की वो गंभीर और धीमा स्वर, 

शाम होते ही शुरू होता था 'कृषि दर्शन' का सफर।

वो 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' की एकता निराली,
 

हर घर में बसती थी एक भोली सी खुशहाली। 
आज हज़ारों चैनल हैं, पर वो बात कहाँ? 

वो सादगी, वो अपनापन, वो जज़्बात कहाँ?

दूरदर्शन सिर्फ एक डिब्बा नहीं, 

एक एहसास था, हम सब के बचपन का सबसे सच्चा विश्वास है ।


मनोज कुमार दुबे
अभियांत्रकी सहायक
दूरदर्शन केंद्र भोपाल