यह दूरदर्शन की अभियांत्रिकी शाखा है

" यह दूरदर्शन की अभियांत्रिकी शाखा है" (एक अनसुनी आवाज़ तकनीकी टीम की ओर से) मैं अभियांत्रिकी शाखा कहलाता हूं, हर तकनीक से वाकिफ हूं, मैं हर विधा का जानकार । नए उपकरण को झट से सीख जाता हूं, पर दूसरों से कम आँका जाता हूं । विशाल संस्था को सुशोभित करता हूं , पर खुद गुमनाम रह जाता हूं। हर फ़ीड, हर सिग्नल में मेरी साँसें बसती हैं, पर अंदर ही अंदर घुट के रह जाता हूं। वो आगे चलते हैं, मैं पीछे रहता हूं, फिर भी हर कदम पर उन्हें संभालता हूं। कभी कैमरा खराब, तो कभी ऑडियो , सबसे पहली दौड़ मैं ही लगाता हूं। न एंकर मेरा नाम पुकारता.. ना अतिथि मेरा काम निहारत। मैं बस ‘वो टेक बंदा’ बनकर केबलों में उलझा जाता हूं । "पॉवर ऑफ, पावर ऑन हो गया क्या?" , बस यही सवाल, सुने जाता हूं। जवाब में बन के पसीना , बस माथे से छलक जाता हूं। मैं ध्वनि में हूं.. प्रकाश में हूं प्रसारण की जान हूं, फिर भी नामों की फेहरिस्त में , कहीं कोने में दब जाता हूं। न मंच पर, न स्क्रीन पर, मैं बस पर्दे के पीछे का व्यक्ति कहलाता हूं। शब्दों में नहीं, वायरिंग में मुस्कराता हूं, हां, मैं पीछे हूं… पर हर फ्रंट को संभालता हूं। मैं ही असली नायक हूं , बस खुद को कम बताता हूं। कयी मंत्रियों संतरियों के रूबरू होता हूं , पर फिर भी बहुत "आम" आदमी सा बना रह जाता हूं। दिन-रात 24x7 ड्यूटी करता हूं, कई बार तो वार -रविवार तक भूल जाता हूं। साल भर के त्योहारों में भी, परिवार को कहां वक्त दे पाता हूं। "सुबह की कर लेना" , मे शाम को मैं आ जाऊंगा.. खास दिनों में भी ऐसे ही थोड़ा सा वक्त निकाल पाता हूं। अपने साथियों के बीच हंसता हूं, पर माननीयों को खुश नहीं कर पाता हूं। यू तो हर फन मैं महारत है, पर मैदान में मात खा जाता हूं। पीठ में जो खंजर फंसे हैं , कुछ अपनों को ही , उन्हें थामे देख पाता हूं। गैरों को तो कोशिशें से समझा पाया था , पर अपनों से ही ना समझी में हार जाता हूं।