कहानी : “ बर्फ
का संतरी ”
अभिषेक बचपन से बाबा बर्फानी के दर्शन करने का सपना देखता था, लेकिन जीवन की दौड़ में यह सपना हर साल टलता गया। 2025 की जुलाई में आखिरकार मौका मिला और वह निकल पड़ा — एक कैमरा, एक डायरी और दिल में आस्था लिए।
अमरनाथ की चढ़ाई आसान नहीं थी। बारिश, पत्थर, साँस की कमी — हर मोड़ पर शरीर थकता, लेकिन मन कहता — "बाबा बुला रहे हैं..."
तीसरे दिन वह शेषनाग पहुँच गया। वहीं एक रात, जब सारे यात्री टेंट में सो गए थे, अभिषेक अकेला बाहर बैठा डायरी लिख रहा था। तभी अचानक चारों ओर कुहासा छा गया। वातावरण में एक अजीब सी ठंडी चमक फैल गई। और फिर... वो दिखा।
एक आदमी, सफेद बर्फ में ढका हुआ, लाठी लिए खड़ा था — न वह पुजारी लगता था, न साधु, लेकिन उसकी आँखें... जैसे पूरी कायनात को देख रही हों।
“तू लिखता है?” उसने धीमी लेकिन गूंजती हुई आवाज़ में पूछा।
अभिषेक ने हाँ में सिर हिलाया।
“तो लिख — श्रद्धा रास्ता दिखा सकती है, लेकिन सत्य को देखने की हिम्मत भीतर से आती है... बाबा से मिलने हर कोई आता है, लेकिन कुछ ही लोग ‘देख’ पाते हैं।”
इतना कहकर वह आदमी धीरे-धीरे बर्फ में समा गया... मानो कभी था ही नहीं।
अगले दिन जब अभिषेक गुफा के भीतर बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुँचा, वह स्तब्ध रह गया — बर्फ से बनी शिवलिंग की छाया हूबहू उसी आदमी जैसी थी जिसे उसने रात में देखा था।
जो भक्त न सिर्फ कदमों से, बल्कि मन से यात्रा करता है — बाबा उसे दर्शन के साथ संदेश भी देते हैं। कुछ यात्राएँ मंज़िल से ज़्यादा अंदर की यात्रा होती हैं।
अभिषेक द्विवेदी
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