हिन्दी पखवाड़ा - 2025
(सांत्वना पुरस्कार)
नाम – राजकुमार बंसल, पद - सहायक
दूरदर्शन केन्द्र, भोपाल
‘‘पर्यावरण एवं
हमारी धरती’’
प्रकृति ने हमारी
धरती को तरह-तरह की नैमत से सवारा है। धरती पर खूबसूरत पहाड़, नदियाँ, झरने, जंगल आदि सजायें हैं। प्रकृति धरती पर मौजूद संसाधनों को
प्राणियों के उपयोग हेतु बनाती है। प्राणी, पृथ्वी पर मौजूद पहाड़ों के बीच स्थित गुफाओं का प्रयोग रहने
के लिए, पानी
का उपयोग पीने तथा वृक्षों का उपयोग उससे प्राप्त होने वाले फलों के लिए करते हैं।
समय के साथ मनुष्य तरक्की करता चला गया एवं उसने प्रकृति के द्वारा प्रदत्त
संसाधनों का दुरूपयोग एवं दोहन करना शुरू कर दिया। प्रकृति ने पहाड़ों के बीच
गुफाओं का निर्माण इसलिए किया था क्योंकि प्रकृति से प्रत्येक जीव अपने भोजन के
लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहता था, तथा इसके लिए वह दूसरें जीवों को मारकर अपनी भूख मिटा लेता
था, किन्तु मनुष्य ने दूसरे जीवों से बचने
हेतु पत्थर एवं लकड़ियों के घर बनाना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप पहाड़ों से पत्थर तोड़े
जाने लगे एवं जंगल से पेड़ों की कटाई करने लगा। पानी में जाने एवं ज्यादा शिकार
हेतु नाव का अविश्कार किया गया। पत्थर एवं खनिजों से अस्त्र-शस्त्र बनाये जाने
लगे। जंगलों को काटकर खेती योग्य जमीन बनाये जाने लगी। धीरे-धीरे मनुष्य ने अपनी
सहूलियत हेतु कई कारखानों का निर्माण किया। कारखानों के निर्माण से उससे निकलने
वाले पानी से नदियाँ एवं तालाब प्रदूषित होने लगे तथा कारखानों से निकलने वाले
धुएं से पर्यावरण को बचाने वाली ओजोन पर्त में भी छेद होने लगे। ओजोन पर्त धरती को
सूर्य के प्रकाश से गर्म होने से बचाती है। ओजोन पर्त में छेद होने के कारण धरती
का तापमान बढ़ने लगा। पहाड़ों पर जमा बर्फ जल्दी पिघल रही है जिससे पीने के पानी का
संकट छा रहा है तथा एक साथ बर्फ पिघलने से नदियों में बाढ़ भी आ रही है जिससे
जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है। मनुष्य यहा तक नही रूक रहा है वह धरती से दूर
अन्य ग्रहों पर जाकर वहाँ भी मनुष्यों की बस्ती बसाना चाहता है जोकि प्रकृति के
नियमों के विरूद्व है। विज्ञान की यही तरक्की मनुष्य और इस धरती के विनाश का कारण
भी बन रही है। हाल ही में आयी हिमांचल और उत्तराखण्ड की बाढ़ त्रासदी के मूल में भी
पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, पेड़ों
की कटाई कर मकान-दुकान, रोड, सुरंग आदि बनाया जा रहा है। मनुष्य नदियों की धारा
मोड़कर व्यावसायिक संस्थानों का निर्माण कर रहा है जिससे नदियाँ प्राकृतिक रूप से
नही बह पा रहीं है एवं विनाश का कारण बन रही हैं। पहाड़ों पर पानी संकट, बड़े-बड़े बांध बनाने से पहाड़ भी कमजोर हो रहे है तथा
पेड़ों के लिए जमीन ही नहीं बच रही है, हालत यह है कि गर्मियों में पूरा देश लू-लपेट से जूझता है
तो बरसात में लाखों लोग जान-मान से हाथ धो बैठते है। बढ़ता शहरीकरण और आधुनिकीकरण
इसका प्रमुख कारण है। यदि हमें हमारी धरती को बचाना है तो हमें हमें युद्वस्तर पर
नये पेड़ लगाना होंगे तथा पुराने पेड़ों को विकास के नाम पर करने से रोकना होगा।
पहाड़ों की कटाई रोकनी होगी तथा नदी-नालों को उसके प्राकृतिक स्वरूप में ही बहने
देना होगा। पेड़ पगाने से ही लोगों को भरपूर भोजन मिलेगा तथा धरती पर गर्मी कम करने
में मदद मिलेगी। हमें हमारी धरती को बचाने हेतु वृक्ष-मित्र बनना ही होगा।