मैंने देखा
आज मैंने धन दौलत के आगे
माता पिता को हारते देखा ।
रिश्तों और संस्कारों को मैंने
पराकाष्ठा के श्मशान में दफ़न होते ।
चारों ओर पानी के सैलाव में
हज़ारों नर मुण्डों को नहाते देखा ।
एक नहीं कई पाटों और घाटों पर
श्रद्धा सुमन अर्पित करते हाथों को देखा।
मोक्ष प्राप्ति की लालसा में मैंने
लोगों को मीलों नंगे पांव चलते देखा ।
चलती रेंगती चाल को भगदड़ मचाते और
लोगों को लोगों द्वारा रोंदते देखा।
अपने सामने जिन्दगी से दूर जाने वाले
मज़र को तमाशबीन बनकर देखा ।
मारे गये लोगों के हाथ से अंगूठी कान से
और गले से मंगलसूत्र चुराते देखा ।
मौत की दहलीज पर खड़ी मां को
लहरों के प्रचण्ड से लड़ते देखा ।
बेटे ने मां की ऊंगलियों पर लगा स्याही
कोरे स्टाम्प पेपर पर निशान लेते देखा ।
क्या दिया सिला मां को उसके बेटे ने
जिसने मां को मरा मान लावारिस की
तरह, उसे छोडकर जाते हुये देखा।
खुशी समेटे वापस जाने वाला बेटा
फंस गया दलदल के मायाजाल में
वह समा गया काल के गाल में
हाथ से छूटे स्टाम्प पेपर को बहकर
मां तक पहुंचते हुये देखा ।
पाप पुण्य का यह लेखा जोखा
मैंने अपनी आंखों से देखा है ।
मरा जानकर मां को छोड़
दिया था, जिसे बेटे ने
उसी मां ने बेटे को अग्नि देकर
मां होने का फर्ज़ निभाते देखा
इस मंज़र को भी मेरी आंखों ने देखा।
- आशीष खरे
कार्यक्रम अधिकारी, आकाशवाणी
केन्द्र, भोपाल