हिन्दी पखवाड़ा - 2025
(द्वितीय पुरस्कार)
नाम - सुनील कुमार पण्डया, पद - अभि. सहायक
पोस्टर आधारित कहानी/कविता लेखन
दूरदर्शन केन्द्र, भोपाल
कविता : शीर्षक - ‘‘सृष्टि’’
कहने
को तो शून्य है, भव सागर ब्रह्मांड का,
पर
इसमें है समाया, कोलाहल जहान का।
अनगिनत
तारों की रेलमपेल, इसमें ग्रहों का तालमेल,
हैं कई
रहस्य समाए, कोई न इसको सुलझा पाए,
है
पक्षियों की चंचलता और अडिगता पर्वत की,
नदियों
को ये लिए गोद में, उड़े फिरे संग बादल सी।
मूक
जानवर और प्राणी भी रहते इसमें साथ-साथ,
सूर्य
की किरणों और सृष्टि, जिसमें देती इनका साथ।
चलते
अपनी तय गति से, सृष्टि के ग्रह एक समान,
जाने
कौन सारथी इनका, उस शक्ति को महा प्रणाम।
हुआ
जन्म जब मानव का, करने को नव-निर्माण,
लगा
कुरेदने सृष्टि को, अहंकारी मानव नादान।
माता
कह कर सृष्टि को, करते फिर उसका अपमान,
आओ
बनाएँ इसको हम, एक सुन्दर सा जहान।
