तो कैसा लगा हमारा मालवण - नीलेश रघुवंशी


 

-तो कैसा लगा, आपको हमारा मालवण ?- नीलेश रघुवंशी 

नदी और समुद्र का संगम या यूँ कहे कि यहाँ पर आकर नदी खत्म हो जाती है। विलुप्त होती हुई चीजें, हमसे नाम की ज्यादा दरकार रखती हंै। ‘कार्ली, ओ कार्ली, अरी ओ कार्ली’ लेकिन नदी तो एकदम शांत है। उसका साफ, चमकता, नीला पानी न कुछ सुन रहा है, न कुछ कह रहा है। समुद्र जरूरत से ज्यादा उछालें मार रहा है। क्या, ये खुशी और दुख को व्यक्त करने के तरीके हैं। नहीं, बिल्कुल नहीं। ये किसी के खत्म होने और किसी को खत्म करने के लुभावने दर्द से भरे क्षण हंै।

नदी समुद्र में मिल रही है या समुद्र ने नदी को अपने में मिला लिया है। ये संगम तो नहीं हैं, और अगर है भी तो सजीव नहीं है। नदी में झाँकती हूँ, वह दूसरी ओर मुड़ने का स्वाँग करती दिख रही है। समुद्र से पूछे बिना अब मुड़ तो सकती नहीं और अब वो बहेगी भी क्यों? अब तो वो उछलेगी, समुद्र उसे अपने साथ उछालेगा। भला, ये कैसा संगम है? जिसमें नदी समुद्र से पूछे बिना मुड़ना तो दूर, साँस भी नहीं ले सकती।

-‘‘देखा आपने, देवबाग में नदी और समुद्र का संगम। फोटो खींची, क्या? फोटो खींचना चाहिए था, आपको। दुबारा कहाँ देखने को मिलेगा आपको ऐसा। ‘हें... हें.. हंे’... दुबारा आएँगे न मालवण?’’ स्थानीय व्यक्ति, वो भी छोटा दुकानदार जो न पूछे, सो कम।

कितना खूबसूरत होता है ‘नेचर’। प्रकृति के बीच आदमी सब कुछ भूल जाता है। उससे एकमेक हो जाता है। सारे राग-द्वेष खत्म हो जाते हैं। देखो, हर आदमी अपने हिस्से भर धूप और पानी ले रहा है। ’देखो, बिना जान पहचान के ही सब एक दूसरे को मुस्कुरा कर देख रहे है। हैं कि नहीं?’’- ‘‘हूँ...सच में। यह जगह बहुत ही खूबसूरत है।’’ मेरे बहुत भीतर से आवाज आई- ‘प्रकृति से इस दुनिया की तस्वीर बदल सकती है। कितना अच्छा हो कि सारे लागों को यहीं प्रकृति के बीचों-बीच खड़ा कर दिया जाए। सारे राग-द्वेष, धर्म-अधर्म, जात-पांत सब यहीं धुल जाएँगे। किसी में कोई फर्क नहीं रहेगा। भष्ट्राचारी,  भष्ट्राचार को तिलाँजलि दे देगा। चोरी, मक्कारी, छल-कपट सब स्वाहा हो जाएँगे। हर आदमी एक दूसरे के जीवन को जीने लायक बनाने की कोशिश करेगा।’’ सोचते हुए जाने कैसे ये बात कह भी गई। हमेशा की तरह मेरे सच्चे दोस्त ने मेरी बात काट दी और मुझे निरूत्तर कर दिया। ये उसके बाएँ हाथ का खेल है।

-‘‘अरे यार, तुम इस लोकेशन का मजा लो। आदमी ऐसे बदलता है, क्या ? शमशान घाट पर जाकर तक तो वो बदलता नहीं है। थोड़ी देर बाद ही लौट आता है, अपनी दुनिया मंे वापस।’’ इसी बीच डाॅलफिन ऊपर आई और लहराते हुए भीतर चली गई। ‘ओ.. ओ.. ओ.., वो पानी के घर में चली गई।

..झाँकती हूँ, पानी में। कैसी हो गई हूँ, मैं? परछाई से मिलती-जुलती, मेरी अपनी शक्ल जाने कहाँ चली गई? मुझे सुकून चाहिए। सुकून भरा नीला रंग, बिल्कुल इस विलुप्त होती कार्ली नदी की तरह। क्या, मुझे नदी बन जाना चाहिए? एक नहीं, कई समुद्र हैं मेरे आसपास, जो घात लगाए बैठे हैं। क्या, मैं भी एक दिन ऐसे ही विलुप्त हो जाऊँगी।

समुद्र तट पर लोग नहा रहे हैं। जितनी उछाल से लहर आती है, तट पर उतना ही शोर बढ़ता जाता है। शोर भी कभी-कभी कितना खूबसूरत होता है। कुछ बच्चे रेत में घर बना रहे हैं। घर बनाने का सपना शायद मनुष्य अपने जन्म के साथ ही लेकर आता है। रेत मंे धँसकर बैठे हुए लोग, ठंडक को अपने भीतर भरते हुए। ये ठंडक व्यक्ति को ऊर्जा से भर देती है। शब्द और अर्थ मिलकर कितनी सहजता से नए-नए अभिप्रायों को जन्म देते हैं।

देवबाग का नाव वाला कह रहा है- ‘कहो ना प्यार है’ फिल्म की शूटिंग यहीं हुई थी। उसके इतना कहते ही पब्लिक झूम-झूमकर लोकेशन का मजा लेने लगी। लोकेशन को तो जैसे अब सर्टिफिकेट मिल गया। वाह रे, सिनेमा। तुम मनोरंजन की अफीम की गोली क्यों बने हुए हो? मुझे तो गुरूदत्त याद आ रहे है-‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’

-‘‘सुनामी जब आई थी, तब यहाँ का पानी एकदम सफेद झक्क झाग जैसा हो गया था। हम सबने अपनी आँखों से देखा। ऐसी सफेदी की बस्स पूछो मत। आए थे हमारे पास पुलिस वाले गाड़ी लेकर। लेकिन हमने मना कर दिया। मर जाएँगे, लेकिन इस किनारे को छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे। देखो ना, सुनामी आई और चली भी गई, लेकिन हमंे कुछ नहीं हुआ। हम सब ठीक हंै। कुछ नहीं होगा, हमें। हम ऐसे ही ठीक हैं। ये जो कर्ली नदी है न, ये हमारे सारे दुखों को बहा ले जाती है।’’

-‘‘लेकिन ये तो समुद्र में चली गई, यहाँ आकर?’’

-‘‘तो क्या हुआ? समुद्र हमारे दुखों को पछाड़ देता है। देखो, कितना वेग है उसमें, हमारे यहाँ इस जगह। मुसीबत के पहाड़ यहाँ समुद्र किनारे नहीं ठहर सकते।’’

 अनुभवी और बुजुर्ग व्यक्ति का कोई सानी नहीं, इस दुनिया में। जीवन और प्रकृति की कितनी सुंदर व्याख्या है, उसके पास।

नदी के पानी के रंग और समुद्र के पानी के रंग में अभी भी अंतर है। बहुत महीन, बारीक-सा। नदी अभी भी अपनी पहचान को बचाए रखी है। बहुत ध्यान से देखना होगा। वो जो लहर उछाल मार रही है, उसमें नदी का पानी हँस रहा है। उसकी चमक ही निराली है। समुद्र की लहर में गोते खाता नदी का पानी वैसे ही आ रहा है, जैसे झूले के बहुत ऊँचाई से नीचे आने पर लोगांे का दिल धड़कता है। जिसमें आधी खुशी और आधा डर छिपा होता है। वो खिला-खिला सा डर बहुत खूबसूरत होता है। नदी भी वैसे ही खिलखिला रही है। लेकिन, आखिरकार नदी अपना अस्तित्व क्यों खोती है? वो भी बिना किसी दुख या पश्चाताप के, बिना कोई संघर्ष  किए। ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है, लेकिन भीतर, बहुत भीतर तक झाँकने पर ऐसा नहीं लगता। बहुत धीमे से बोल रही है नदी-’’दूसरों के बारे में सोच-सोचकर बहते हुए, खुशियाँ बिखेरते हुए, वह बहती, बहती ही जाती है और समुद्र कब उसे अपने आगोश में ले लेता है, उसे मालूम ही नहीं पड़ता। और अब जब उसे मालूम पड़ने लगा है कि वह दूर, बहुत दूर किसी मोड़ पर जाकर विलुप्त हो जाएगी तो वह कुछ कर भी नहीं सकती। क्योंकि ‘बहना’ उसका स्वभाव है, ठहरना वह जानती ही नहीं। ठहर गई तो नदी कैसे हुई?

लेकिन यहाँ इस क्षण तो ठहरी हुई है? -‘‘क्यों, तुम ठहरी हुई हो ना?’’ -‘‘नहीं, मैं ठहरी हुई नहीं हूँ। तुम स्वप्न दोष के नहीं, दृष्टि दोष के शिकार हो। बोलते बहुत हो भई, तुम लोग। क्या कहूँ तुम्हें, मैं ठहरी हुई नहीं हूँ? तुम ठीक से देख नहीं पा रहे हो, मुझे। समुद्र अपने सिवाए किसी और को देखने भी तो नहीं देता। वह अपनी भव्यता के आगोश में सबको चकित करता है। देखो, ध्यान से देखो मैं बह रही हूँ अभी भी। और ये भी कौन जानता है कि समुद्र सच में हमें अपने में मिलाना चाहता भी है या नहीं। और ये कोई नहीं जानता कि हम नदियाँ भी समुद्र में मिलना चाहती भी हैं या नहीं। सच कोई नहीं जानता। न तुम, न मैं, न वे और न यह समुद्र।’’ 

-‘‘इस चक्र को बदलना चाहिए?’’-‘‘चक्र को बदलना चाहिए?’’ जबाव में पास खड़े बुजुर्ग ने ऐसी फटकार लगाई कि पूछो मत। -‘‘बड़े आए, चक्र को बदलने वाले। आधे घंटे में इन्हें नदी भी समझ पड़ गई और समुद्र भी। देखो तो भला, चले हंै ये चक्र को बदलने।’’ दादाजी के हाथ में छड़ी है और गुस्से में कँपकँपा रही है, वो।

 


मालवण में लोगों ने अपने घरों में होटल खोल रखे हैं। यहाँ हर घर में दुकान है। यह और बात है कि लोगों से ज्यादा दुकानें हैं, जिनमें घर दुबक गए हैं। घरों को दुकानें लील गई हैं। ये बच्चों को जन्म के साथ ही दुकानदार बनातीं और ग्राहक की प्रतीक्षा करना सिखातीं हैं।

  गिलास में पानी भरते वह दुकानदार बोला-‘’तो देखा आपने हमारा मालवण?’’

      -‘‘हाँ-हाँ भई, किला भी देखा। द्वीप भी देखे और देखा समुद्र को नदी में मिलते।’’ हँसते हुए कहा मैंने। प्रत्युत्तर में हँसते हुए बोला वह-‘‘समुद्र को नदी में मिलते नहीं, नदी को समुद्र में मिलते हुए देखा।’’ इतना कह वह अपनी पत्नी को देखकर और भी खुलकर हँसा। पत्नी हम दोनों को देख हँसी, जैसे दोनों के साथ है वह। वे खुश, बहुत खुश थे। उनका मालवण सबको अच्छा जो लगता है।

मन ही मन कहा मैंने-‘‘लेकिन मैं तो तुम्हें देखना चाहती हूँ। कैसे तुम अपनी गृहस्थी चलाते हो? कैसे दुकान को घर और घर को दुकान बना देते हो, पल भर में। देर रात जब हम खाना ढँूढते हुए, तुम्हारी दुकान में आए, तब तुम सब बिछौने लगाकर सोने जा रहे थे कि हमें देखते ही झटपट अपना बिस्तरा समेट कर कोने में घुसा दिया और खाली जगह को बेंच टेबिल से भर दिया। पल भर में घर को दुकान बना दिया। आधी रात के ग्राहक को भी तुम ना नहीं कह पाते। छोटी सी चाय-रोटी की दुकान में पूरा परिवार भिड़ा रहता है। क्या, कभी खा पीकर कह पाए- ‘‘बड़ी अच्छी ग्राहकी हुई, भरपेट खाया भी और सारा सामान भी आ गया। ऊपर से कुछ पैसे भी बच गए।’’ कल की जुगाड़ का कोई कोना भी है क्या, तुम्हारे पास। अरे भई। नदी, समुद्र, पेड़-पहाड़, किले के अलावा कुछ अपनी भी तो कहो। 

-‘‘फिर आना।’’ उन सबने कहा।

-‘‘हाँ जरूर, जरूर।’’ कहा मैंने। पूरा परिवार प्रत्युत्तर में एक साथ बोला-‘‘अगली बार भी हमारे यहाँ ही चाय पीना और खाना खाना और अपने दोस्तों को मालवण भेजना। हमारी दुकान का पता भी देना साथ में।’’-‘‘जी, जरूर।’’ हमने हाथ जोड़कर, हँसकर एक दूसरे से विदी ली। वे सब छूट गए थे, लेकिन फिर भी साथ थे। वे कुछ पूछ रहे थे और मैं जबाव भी दे रही थी।

 -तो, कैसा लगा, आपको हमारा मालवण? 

-‘‘सुंदर, बहुत सुंदर।’’

-‘‘अच्छा है, न? सब यही कहते हैं।’’

-‘‘सुंदर, बहुत सुंदर।’’...

इसके आगे कुछ और कहने की जरूरत ही नहीं थी। एक बार फिर सौंदर्य ने जीवन के मूलभूत प्रश्नों को परे धकेल दिया था।

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देवबाग बीच-मालवण महाराष्ट्र