अदृश्य रिश्ता

 

अदृश्य रिश्ता ..

 

भोर हो गई है

और बारिश भी तेज है..

आज कैसे वह आयेंगे दाना

चुगने.. ?

 

बारिश होती रही तो

क्या भूखे रहेंगे,अपने बच्चों

को क्या

खिलायेंगे ?

 

व्याकुल हो

मिलने की चाह में

छत पर गया..

मेरे भोर के मित्र

बारिश में भीगते हुए

मुंडेर पर बैठ कर मेरा

इंतज़ार कर रहे थे !

मुझे देख पंख फड़फड़ा

कर स्वागत करने लगे

मेरे मूक मित्र..

उनका प्रेम

भीगा गया मेरा अंतर्मन !!

 

घर पर बैठ

सोच रहा था उनके

आशियाने का..

पहले उनका घर भी

हमारे घरों में ही

हुआ करता था ..

तब भोर उनके

कोलाहल से ही

हुआ करती थी !!

 

सुनो जब मिलने की

तड़प दोनों को है

तो कभी घर भी आया करो..

तेरी आस में

खिड़की खुली रखूँगा..

बारिश में दाना भी

वहीं पहुंचाया करूँगा!!

 

मैं सुकून से रहूँ और तुम

भीगते रहो..

अच्छा नहीं है,

घर आया करो ..

यूँ न मुंडेर पर बैठ भीगा करो!

 

यूँ न मुंडेर पर बैठ भीगा करो!!

 

आर के बाजपेयी

सेवानिवृत सहायक निदेशक

दूरदर्शन केंद्र, भोपाल